कलियुग में दुःख का कारण और कल्याण का रहस्य*-2


अन्यस्य दोष गुण चिन्तनमाशु मुक्त्वा सेवा कथा रसमहो नितरां पिबत्वम्* *||*
अर्थ :- *अन्य याने दूसरों के दोषऔर गुण दोनों के चिंतन से तुरंत मुक्त होकर भगवद सेवा और भगवद कथा के रस को निरंतर (सतत) श्वास के साथ लेते रहो और तन- मन से पीते रहो* ||
श्रीमद भागवतजी में श्री शुकदेवजी समजा रहे है की *अन्यके अर्थात् परमात्मा आनंदरूप कृष्ण के अलावा जो है सब अन्य ही है हम स्वयं भी अन्य याने दुसरे ही हैं* तो
*कृष्ण के अलावा किसीके बारेमें मन बुद्धि से चिंतन करना वो अपने आनंद को ख़त्म कर प्रभु को अपने से दूर करना है*
अत: न स्वयं के दोषों का चिंतन और *चिंतन माने खुद चलाकर मन बुद्धिसे सोचना बार बार वह चिंतन है*
तो वो न करे
*न अपने दोषों की चिंता और अपने गुणों के बखान न करें* और *दुसरे के गुणों का एवं दुसरेके दोषोंका चिन्तन बंदकर प्रभुकी रूपमाधुरी , लीला माधुरी , कथा माधुरी , का चिंतन करें जिससे उनका सदा स्मरण होगा* और
*उनके स्मरणसे वह परमानंद प्रभु हमारे दिल में बस जायेंगे और हम भी आनंदमय हो जायेंगे* |
इससे
*हमारा अंतर एकदम उत्तम इत्र की तरह प्रेम-आनंद-सहजता से सराबोर होकर महेकने लग जायेगा और दूसरों को भी उस की सुवास से सुवासित करेगा ||*
*यही आनंद की साधना है* |
जय श्री कृष्ण
*वेदान्ताचार्य पू श्रीगिरिराजजी*
*के प्रवचन से साभार*