नव विलास


आसों(क्वांर)सुद पड़वा से आसों सुद दशमी तक पुष्टिमार्ग में ललिताजी के सेवा मास का आरंभ होता है जिसमें आसों सूद पड़वा से आसों सूद दशम तक नव-विलास, प्रभु विरह के ताप में श्री स्वामनिजी ने सखियो के साथ का प्रभुमिलन के लिए व्रत किया है। नव प्रकार के भक्त और एक निर्गुण भक्त के भाव से ये दस दिन की लीला है।

एकम अर्थात पड़वा के दिन जवारा बो कर नाच गान कर प्रभु मिलन की आस में दिन व्यतीत करते हैं, यही जवारे विजयादशमी के दिन प्रभु मस्तक पर धराते हैं और प्रसादी रुप में सब लेते हैं। ज्वार भक्ति का प्रतिक हैं। उत्सव के नौ दिनों में प्रतिदिन नूतन भाव अंकुरित होते हैं।
प्रभू के चरणारविंद में पृथक पृथक सोलह चिन्ह के दर्शन होते हैं, उसमें दाये चरण में सब से पहले 'जव' का चिन्ह का दर्शन होता है।
जवारा नव विलास के नौ दिनों में प्रभु को विलास कराने के लिए मन में उद्ववेग सहित प्रभु को भजते हुए हम नवधा भक्ति-दर्शन, श्रवण, मनन, चिंतन, कीर्तन, अर्चन, पाद सेवन ,... से आत्मनिवेदन भक्ति की सिद्धि होती है।
प्रभु को आनन्द देने के लिए तीनों- सात्विक, राजस, तामस भक्त खेलते है।, जिसको विलास कहते हैं, खेलने के लिए शक्ति अनिवार्य है और शक्ति का प्रतीक है त्रिशूल। ये तीनों प्रकार की शक्ति के खेलने पर प्रेमलक्षणा भक्ति बनती है, और प्रेम एवं सर्व शक्तियों की अधिष्ठाता श्रीस्वामिनीजी हैं इसी कारण श्रीस्वामीजीके चरण चिन्ह में त्रिशूल का प्रतीक है।
त्रिशूल का पहला शूल सात्विक भक्ति का प्रतीक है अर्थात योगमाया, कात्यायिनी, आच्छादित और विक्षेपिका। दूसरा शूल राजस भक्ति का प्रतीक अर्थात चंद्रवलीजी, ललिताजी, वृदा और संकेता। तीसरा शूल अर्थात तामस भक्ति प्रतीक रुप अर्थात नौवारी चौवारी, विमला और आनंदी। ये सभी प्रकार की शक्तिओं अर्थात प्रभु और स्वामिनीजी, जो अपनी अष्ट सखिओं के साथ (१+८=९) नौ दिवस विलास रास करते हैं, जिसको हम नव विलास कहते हैं यह विलास समस्त व्रज में निश्चित स्थल,श्रृंगार, सामग्री के साथ, जो जो सखी के मनोरथ स्वरुप होता है तदानुसार उसके सखा, किर्तनकार भी निश्चित होते हैं।
आठ सखीओं सहित नवम श्रीस्वामिनीजी, ऐसे नवधाभक्ति और प्रेम पूर्वक प्रभु को नव विविध स्थलो पर विलास खेल कराने से वो प्रेम लक्षणा में परिणती भक्ति से प्रभावित होते हैं और प्रभु राधाजी की विजय मानते हैं। भक्ति की बृद्धि स्वरुप बढे हुए जवारे ही विजयादशमी के दिन प्रभु अपने श्री मस्तक पर धारण करते हैं।
नव दिवस नव विलास खेल में नित एक सखी का भाव होता है, उस उस सखी के मनोरथ से नौ दिवस तक वन में जा कर पूजा होती है।
श्री लाडली लाल प्रिया-प्रियतम (राधाजी) की आठों सखियों का विवरण इस प्रकार है।
१- प्रथम विलास - मुख्य सखी चंद्रावली, मुख्या स्थल निकुंज भवन ,वस्त्र -लाल छाप के, मस्तक पर कुल्हे काम की जोड़, सामग्री -सेव के लड्डू।
२. द्वितीय विलास - मुख्य सखी ललिताजी, स्थल -संकेत विहार, वस्त्र -पीले छाप के, मस्तक पर मुकट, सामग्री मोहन् थाल
३-तृतीय विलास- मुख्य सखी विशाखाजी, स्थल- निकुंज महल, वस्त्र -हरे छाप के ,मुकुट काछ के, सामग्री-पपची।
४- चतुर्थ विलास - मुख्य चंद्रभागा सखी, स्थल -पारासोली वन, वस्त्र- सफ़ेद छाप के, मुगट, सामग्री -जलेबी, सिकोरी खंडमंडा.
५- पंचावो विलास - मुख्य संजावली सखी, स्थल- कदली वन , वस्त्र सब रंग के ,मुकुट, सामग्री - मोहनथाल।
६- छठो विलास - मुख्य सहचरी राइ सखी, स्थल-गोधनवन्, वस्त्र-छापा, मुकुट, सामग्री-मालपुवा।
७- सतावाँ विलास- मुख्य कृष्णावती सखी , स्थल -गहवर वन, वस्त्र- छापा, मुकुट, सामग्री- डेढ़ वडी।
८-आंठवाँ विलास - मुख्य भामा सखी,
स्थल- शांतनकुंड, वस्त्र -छापा के, मुकुट, सामग्री-कचोरी।
९- नवम विलास- मुख्य सहचरी-नवधा भक्त , स्थल-बंसीबट, वस्त्र-छापा, श्रृंगार इच्छानुसार, सामग्री - खोया के गूजा , पोहा।
कुञ्ज द्वार में युगल स्वरुप पधारे, नवधा भोजन और नवरस रास विलास कराके और पूर्ण पुरुषोत्तम के दर्शन करे।
ये सब आठों सखियाँ हर क्षण प्रिया-प्रियतम के मुख मंडल तथा उनके रुप माधुरी को देख-देख कर जीती हैं। प्रिया-प्रियतम का श्रीमुख चंद्र दर्शन ही इनके जीवन का आधार है कम देखें