जलभेद/ Jalbedah


श्रीकृष्णाय नमः



श्रीमदाचार्यचरणकमलेभ्यो नमः ॥



श्रीमन्महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य विरचित



जलभेदः



नमस्कृत्य हरिं वक्ष्ये तद्गुणानां विभेदकान् ।



भावान् विंशतिधा भिन्नान् सर्व सन्देहवारकान् ॥१॥



भावार्थ:- श्रीहरि को नमन करके वक्ताओं के गुण का भेद बताने वाले समस्त सन्देहों को दूर करने वाले बीस प्रकार के भावों को कहता हूँ ॥१॥



 गुणभेदास्तु तावन्तो यावन्तो हि जले मताः ।



गायकाः कूपसङ्काशाः गन्धर्वा इति विश्रुताः॥२॥



 भावार्थ:- जितने प्रकार के जल के गुणों में भेद हैं उतने वक्ताओं में भी भेद है, गाने वाले गन्धर्व नाम से प्रसिद्ध हैं वे कूप जल के समान होते हैं ॥२॥



 कूप भेदास्तु यावंतस्तावंतस्तेऽपि सम्मताः ।



 कुल्याः पैराणिकाः प्रेक्ताः पारम्पर्ययुता भुवि ॥३॥



 भावार्थ:- जितने कूप के भेद हैं उतने वक्ताओं के भी माने गये हैं इस भूमण्डल में परम्परा वाले पौराणिक नहर के जल के सदृश हैं ॥३॥



क्षेत्रप्रविष्टास्ते चापि संसारोत्पत्तिहेतवः ।



वेश्यादिसहिता मत्ता गायका गर्तसंज्ञिताः ॥४॥



 भावार्थ:- जो वक्ता अपने कुदुम्ब के भरण पोषण के निमित्त कथादि कहते हैं वे खेत में प्रविष्ट जल के समान हैं ।



और जो गायक वेश्यादि के सङ्ग रहकर उन्मत्त होकर गान करते हैं वे गड्ढे के जल के समान हैं ॥४॥



जलार्थमेव गर्तास्तु नीचा गानोपजीविनः ।



ह्रदास्तु पण्डिताः प्रोक्ता भगवच्छास्त्रतत्पराः ॥५॥



भावार्थ:- जो गायक अपनी आजीविका के निमित्त गान करते हैं वे गड्ढ के गन्दे जल के समान हैं,



भगवत् शास्त्र में तत्पर विद्वज्जन तो निर्मल सरोवर के सदृश कहे गये हैं ॥५॥



 सन्देहवारकास्तत्र सूदा गम्भीरमानसाः ।



 सरःकमलसम्पूर्णाः प्रेमयुक्तास्तथा बुधाः॥६॥



 भावार्थः– जो वक्ता गम्भीर मन वाले हैं तथा अपने श्रोताओं के सब प्रकार के सन्देहों को निवारण करने वाले हैं।



ऐसे प्रेमयुक्त पण्डितजन कमलों से सुशोभित सरोवर के समान हैं ॥६॥



अल्पश्रुताः प्रेमयुक्ता वेशन्ताः परिकीर्तिताः ।



 कर्मशुद्धाः पल्वलानि तथाऽल्पश्रुतभक्तयः ॥७॥



 भावार्थ:- भगवत प्रेम में निमग्न, स्वल्प शास्त्र के ज्ञानवाले वक्ताओं को छोटे तालाब के जल के सदृश कहा है ।



और जिन के कर्म शुद्ध हैं तथा अल्प ज्ञान और अल्प भक्ति वाले हैं उनको जङ्गली छोटे गड्ढे के जल के समान कहा है ॥७॥



योगध्यानादिसंयुक्ता गुणा वर्ष्याः प्रकीर्तिताः ।



तपोज्ञानादिभावेन स्वेदजास्तु प्रकीर्तिताः ॥८॥



 भावार्थः– योग ध्यानादि सम्पन्न भगवद्गुण गाने में तत्पर रहने वाले वर्षा ऋतु के जल के समान हैं ।



और जो तप तथा ज्ञान आदि से रहित हैं वे प्राणी शरीर के पसीने के तुल्य कहे गये हैं ॥८॥



 अलौकिकेन ज्ञानेन ये तु प्रोक्ता हरेर्गुणाः ।



कदाचित्काः शब्दगम्याः पतच्छब्दाः प्रकीर्तिताः॥९॥



 भावार्थ:- जो अलौकिक ज्ञान से किसी समय शब्द के द्वारा जानने योग्य श्रीहरि का गुणगान करते हैं वे पर्वत से गिरने वाले



प्रताप (निर्झर) के जल के समान कहे गये हैं॥९॥



 देवाद्युपासनोद्भूताः पृष्वा भूमेरिवोद्गताः ।



 साधनादिप्रकारेण नवधा भक्तिमार्गतः ॥१०॥



प्रेममूर्त्या स्फुरद्धर्माः स्यन्दमानाः प्रकीर्तिताः ।



 भावार्थ:- देवताओं की उपासना करने वाले वक्तागण पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले स्वल्प जल के समान कहे गये हैं ।



प्रेमपूर्वक नवधा भक्ति मार्ग के द्वारा भगवान का स्मरण रूप धर्म जिनका परम साधन है । ऐसे वक्ताओं को पर्वत



से निकले हुए निर्झर के परम पवित्र निर्मल जल के समान कहा है ॥१०॥



 यादृशास्तादृशाः प्रोक्ता वृद्धिक्षयविवर्जिताः ॥११॥



 स्थावरास्ते समाख्याता मर्यादैकप्रतिष्ठिताः ।



भावार्थ:- जिस प्रकार पहले कहे गये हैं उसी प्रकार नवधा भक्ति के अनुसार साधनयुक्त वृद्धि और क्षय से रहित



अर्थात् सांसारिक सुख, दुःख हीन और मर्यादा मार्ग में परिनिष्ठित वक्ता महाशयों को स्थावर जलाशय के सदृश कहा है ॥११॥



 अनेकजन्मसंसिद्धा जन्मप्रभृति सर्वदा ॥१२॥



 सङ्गादिगुणदोषाभ्यां वृद्धिक्षययुता भुवि ।



 निरन्तरोद्गमयुता नद्यस्ते परिकीर्तिताः ॥१३॥



 भावार्थः- जो अनेक जन्मों से सिद्धि के लिये प्रयत्नशील हैं परन्तु जन्मान्तरों में दुःसंग और सुसंग के गुणदोषों से ईश्वर में



उनका प्रेम कभी कम और कभी अधिक हो जाता है वे निरन्तर प्रवाह वाली नदी के जल के समान हैं ॥१२-१३॥



एतादृशाः स्वतन्त्राश्चेत् सिन्धवः परिकीर्तिताः ।



 पूर्णा भगवदीया ये शेषव्यासाग्निमारुताः ॥१४॥



भावार्थः – उपरोक्त १७वें वक्ताओं के सदृश स्वतन्त्र हों तो अर्थात् मन की सब उपाधि से, मुक्त हों तो वे सागर में मिलने



वाली बड़ी नदी के तुल्य हैं। जैसे कि पूर्ण भगवदीय शेष, व्यास,अग्नि, श्रीवल्लभाचार्यजी, हनुमान इत्यादि हैं ॥१४॥



 जड़नारद मैत्राद्यास्ते समुद्राः प्रकीर्तिताः ।



लोकवेदगुणैर्मिश्रभावेनैके हरेर्गुणान् ॥१५॥



 वर्णयन्ति समुद्रास्ते क्षाराद्याः षट् प्रकीर्तिताः ।



 भावार्थ:- इसी प्रकार जड़भरत, नारद, मैत्रेय आदि महानुभावों को समुद्र के जल के समान कहा है ।



और जो वक्ता लौकिक और वैदिक गुणों से मिश्रित श्रीहरि के गुणानुवाद को गाते हैं वे क्षारादि छः समुद्रों के समान कहे गये हैं ॥१५॥



 गुणातीततया शुद्धान् सच्चिदानन्दरूपिणः ॥१६॥



सर्वानेव गुणान् विष्णोर्वर्णयन्ति विचक्षणाः ।



 तेऽमृतोदाः समाख्यातास्तद्वाक्पानं सुदुर्लभम् ॥१७॥



 भावार्थः– जो वक्ता गुणातीत, शुद्ध और सच्चिदानन्द रूप विष्णुभगवान के समस्त गुणों का ही वर्णन करते हैं,



वे अमृत सिन्धु के समान कहे गये हैं उनके वचनामृत का पान परम दुर्लभ है ॥१७॥



 तादृशानां क्वचित् वाक्यं दूतानामिव वर्णितम्।



 अजामिलाकर्णनवद् बिन्दुपानं प्रकीर्तितम् ll१८ll



 भावार्थ:- इस प्रकार के भगवदीयों के वचनामृत का पान कहीं कहीं पर भगवत् पाषदों के समान हैं।



जिस प्रकार अजामिल के समान उनके वाक्यों को बिन्दुपान के समान सुखकर कहा गया है ॥१८॥



 रागाज्ञानादिभावानां सर्वथा नाशनं यदा ।



 तदा लेहनमित्युक्तं स्वानन्दोद्गमकारणम् ll१९ll



 भावार्थ:- जबकि सांसारिक राग और अज्ञानादि पूर्णरूप से नष्ट हो जाते हैं । उस समय का भगवद्गुण गान अपने



आनन्द को उत्पत्ति का कारण हो जाता है। तब वह लेहन जल के सदृश कहा जाता है । ऐसे वक्ता अपने आप सदैव गुणगान में तत्पर रहते हैं॥१९ll



 उदधृतोदकवत् सर्वे पतितोदकवत् तथा ।



उक्तातिरिक्तवाक्यानि फलं चापि तथा ततः ॥२०॥



 भावार्थ: :- ऊपर जितने प्रकार के वक्ताओं के भेद कहे गये हैं इनके अतिरिक्त दूसरे प्रकार के जो वक्ता हैं जिनका



उल्लेख इस ग्रन्थ में नहीं किया गया है वे सब अपने उपयोग कर लेने के पश्चात् जो निरर्थक जल है उसके समान



उन्हें निरर्थक ही जानना । सारांश यह है कि ऐसे निरर्थक वक्ताओं को तथा उनके श्रोताओं को किसी प्रकार का लाभ नहीं हो सकता ॥२०॥



इति जीवेन्द्रियगता नानाभावं गता भुवि ।



 रूपतः फलतश्चैव गुणा विष्णोर्निरूपिताः ll२१ll



भावार्थ:-इस प्रकार जीवों की इन्द्रियों में विद्यमान विष्णु भगवान के गुणों का अनेक जलके भेदों के दृष्टान्त



देकर उनके रूप तथा फल सहित मैंने (श्रीवल्लभाचार्य ने) निरूपण किया है ॥२१॥



 ॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितो जलभेदः सम्पूर्णः ॥१२॥