यज्ञ का स्वरूप यह भी (अद्भुत हविष्य)
राजा खनिनेत्र के राज्य में सब प्रकार से शांति तथा सुख सम्पत्ति होने के बाद भी उन्हें एक दुख था कि उनके कोई संतान नहीं थी। वे बहुत ही धार्मिक तथा दानी राजा थे। उनकी मृत्यु के बाद राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा, तथा पितरों को तर्पण देने के लिए कौन है? कोई संतान न होने से वृद्धावस्था में उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं । इस प्रकार से दुःख और उनकी इस चिंता को देखकर उनके कुलगुरु ने एक यज्ञ करने के लिए कहा और यह भी कहा कि यह राजस सकाम यज्ञ होगा। इसलिए इसमें किसी जीव की बलि देनी होगी। यज्ञदेव के प्रसन्न होने के बाद फिर पुत्रेष्टि यज्ञ किया जाएगा, जिसके फल से आपको संतान पैदा होगी। कुलगुरु के कहे अनुसार महाराज ने यज्ञ प्रारंभ किया। यज्ञ समाप्ति के पूर्व यज्ञ में किसी जीव की बलि के लिए महाराज वन में शिकार के लिए गए तो अचानक एक मृग सामने आ गया। राजा बाण से उसका शिकार करते, उसके
पहले ही उसने कहा, “राजन्! शरसंधान की आवश्यकता नहीं है। अपने यज्ञ में बलि देने के लिए आप मुझे ले चलिए, मैं स्वयं तैयार हूं। मेरे मांस की बलि अपने यज्ञ में दीजिए।"
राजा आश्चर्यचकित थे। एक मृग को स्वयं आगे आकर अपने को मृत्यु के हवाले करते देख उन्होंने उससे पूछा, "मृगराज! तुम इस प्रकार स्वेच्छा से क्यों प्राण त्याग करना चाहते हो ? क्या तुम मुझ पर उपकार करना चाहते हो। मृग ने कहा, "राजन्! मैंने यह प्रस्ताव आप पर उपकार के लिए नहीं, बल्कि अपने उपकार के लिए रखा है। मेरे कोई संतान व परिवार नहीं है। मैं अपने इस एकाकी जीवन तथा संतानहीनता से दुखी हूं, इसलिए इस दुख से मुक्ति के लिए सहर्ष देह त्याग की इच्छा से आया हूं। मृग की ऐसी बात सुनकर राजा कुछ देर सोच-विचार करते रहे। फिर कहा, “मृगेन्द्र ! तुम भी मेरे जैसे दुखी हो, अतः मुझ जैसे ही दुखी तुम्हारा मांस यज्ञदेव स्वीकार नहीं करेंगे। तुम जाओ।" वह मृग चला गया। कुछ दूर चलने पर उन्हें एक मृग और दिखाई दिया। उसने भी राजा को शिकार के लिए घूमते देख लिया। राजा अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर उसे लक्ष्य बनाते कि वह मृग स्वयं दौड़ता हुआ आया और बोला, “राजन्! कष्ट मत करो। आपके यज्ञ की हवि बनने के लिए मैं स्वयं आपके साथ चलता हूं। इस प्रकार स्वयं को मौत के हाथों समर्पित करते देख आप सोचेंगे कि मैं क्यों देह त्याग करना चाहता हूं, तो आपके प्रश्न से पहले ही मैं उत्तर दे रहा हूं कि मैं अधिक संतान की चिंता से दुखी हूं। इन संतानों के कारण मेरा अपना जीवन व्यर्थ हो रहा है। संतानों की पारस्परिक कलह तथा उनके सुख-दुख का भार ढोते-ढोते मैं तो जीते-जी मृत प्राणी हो गया हूं, इसलिए सोचता हूं, यह देह अगर किसी अन्य का दुख दूर करने में थोड़ी-सी सहायक हो तो इस देह को सार्थक कर लिया जाए। आत्मा का क्या, वह तो जन्म-मरण से परे है। उसे जीने-मरने का क्या दुख।"
मृग की ऐसी बातें सुनकर राजा के हाथ से धनुष तथा बाण नीचे गिर गया। वे सोचने लगे कि इस वन्य प्राणी को मेरे दुख का पता कैसे चला। मैं किस उद्देश्य से शिकार के लिए आया हूं, इसने कैसे जाना तथा इतनी ज्ञान भरी बातें करने वाला मृगरूप धारी यह कौन है ? यह सोचकर राज ने हाथ जोड़कर कहा, "मृगेन्द्र! आप अपने वास्तविक रूप में आइए।। आपको प्रणाम करता हूं, आपने मेरा दुख कैसे जाना ?”
मृग ने कहा, "राजन् ! इस तपोवन में वन्य-जीव तथा ऋषि ही रहते हैं ।ऋषि भी कभी-कभी अपने मन बहलाव के लिए जंगल का आनंद उठाने रूप बदल-बदल कर विचरते हैं। मैं भी मृग के रूप में घूम रहा हूं। इस स्थान पर आप तामस भाव से घूम रहे हैं। अंतर्दृष्टि से मैंने आपकी इच्छा जान ली इसलिए इस देह का मोह छोड़कर मैंने स्वयं को आप पर उपकार करने प्रस्तुत किया।"
राजा के नेत्र खुल गये, संतान के मोह से ही उसे वैराग्य हो गया। ये सब मोह-ममता दुख के कारण होते हैं। जो है उसी में जीना है। निष्काम जीवन ही सुख का मार्ग बताता है। राजा बिना शिकार किए लौट आए। आकर कुलगुरु से कहा, “गुरुदेव! यज्ञ समाप्त कर दीजिए, मेरी अब कोई कामना नहीं रह गई। यह जीवन, राज्य, धन-सम्पत्ति जो भी है वह प्रभु की है। मैं तो निमित्त मात्र हूं। मेरे पहले क्या था, मेरे बाद क्या होगा, यह सोचना व्यर्थ है। इस यज्ञ में जीवन बलि की बजाय मेरी भावनाओं, कामनाओं, वासनाओं, सुख-दुख सबको हविष्य बनाकर यज्ञदेव को अर्पित करें। मैं अब निष्काम स्थितप्रज्ञ हूं। मुझे कुछ नहीं चाहिए ।” कुलगुरु ने कहा, “राजन् ! सचमुच यज्ञ पूरा हुआ। मैं सीधे भी पुत्रेष्टि यज्ञ कर सकता था, पर आपको इस सांसारिकता के सुख-दुख से मुक्त रहने के लिए ही मैंने यह आयोजन किया था।"
इतने में ही यज्ञाग्नि से इन्द्रदेव प्रकट हुए और कहा, “राजन् खनिनेत्र ! यज्ञ को अर्पित किया हविष्य व्यर्थ नहीं जाता। तुमने अपना जो कुछ हविष्य बनाकर अर्पित किया, उसे देवों ने यज्ञ-भाग के रूप में स्वीकार कर लिया। उसे प्राप्त कर प्रतिफल दिए बिना हविष्य अपच हो जाएगा। समय पाकर तुम्हारे इस पुण्य-राज्य का उत्तराधिकारी जन्म लेगा। तब उसे यह सब सौंपकर अपना शेष जीवन स्थितप्रज्ञ तपस्वी की तरह बिताना।"